सामाजिक सुधारक, शिक्षाविद और जाति-विरोधी कार्यकर्ता · उन्नीसवीं शताब्दी के महाराष्ट्र में महिला शिक्षा और दलित उत्थान के अग्रदूत।
ज्योतिराव गोविंदराव फुले उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय सामाजिक सुधारक, लेखक और शिक्षाविद थे, जिन्होंने जाति प्रथा को चुनौती दी और भारत में महिला शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया। माली (एक निम्न शूद्र जाति) परिवार में जन्मे फुले ने जातिगत भेदभाव का स्वयं अनुभव किया और अपना संपूर्ण जीवन सामाजिक असमानता के उन्मूलन के लिए समर्पित कर दिया।
अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर, उन्होंने 1848 में पुणे में भारत की पहली बालिका विद्यालय की स्थापना की। उनके कार्य ने आधुनिक जाति-विरोधी आंदोलन की नींव रखी और बाद में डॉ. बी.आर. अंबेडकर तथा महात्मा गांधी जैसे नेताओं को प्रभावित किया।
फुले के दर्शन के तीन स्तंभ थे: सार्वभौमिक शिक्षा, जाति का विनाश और महिला सशक्तिकरण। उन्होंने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जो जातिगत भेदभाव के विरुद्ध लड़ने और सामाजिक समानता को बढ़ावा देने के लिए समर्पित था।
फुले का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव है:
💡 परीक्षा संकेत: भारतीय सामाजिक सुधारकों पर चर्चा करते समय, फुले के अद्वितीय योगदानों को याद रखें: वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने व्यवस्थित रूप से महिला शिक्षा और जाति उन्मूलन को जोड़ा, और उन्होंने एक ऐसा आंदोलन (सत्यशोधक समाज) स्थापित किया जो स्पष्ट रूप से राजनीतिक था, न कि केवल धार्मिक या आध्यात्मिक। यह उन्हें पूर्ववर्ती भक्ति सुधारकों से अलग करता है।
अंतिम अद्यतन: 2026-08-06
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