सबसे बड़ी संख्या के लिए सर्वोच्च सुख — बेंथम, मिल, और नैतिक भले की गणना।
उपयोगितावाद पश्चिमी दर्शन के इतिहास में सबसे प्रभावशाली और व्यापक रूप से बहस किए गए नैतिक सिद्धांतों में से एक है। इसके मूल में, यह मानता है कि नैतिक रूप से सही क्रिया वह है जो सबसे अधिक संख्या में लोगों के लिए समग्र सुख या कल्याण उत्पन्न करती है। यह सरल-सा लगने वाला सिद्धांत — "सर्वोच्च सुख का सिद्धांत" — दो शताब्दियों से अपराध कानून सुधार, कल्याण अर्थशास्त्र, सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति, और लोकतांत्रिक सिद्धांत को आकार दे रहा है। इसकी न्यायसंगतता सिद्ध करने, व्यक्तिगत अधिकारों को मिटाने, और मानव जीवन की समृद्धि को सुख और दर्द की गणना में कम करने के लिए इसकी भी कड़ी आलोचना हुई है।
इस सिद्धांत का व्यवस्थीकरण जेरेमी बेंथम ने अठारहवीं शताब्दी के अंत में किया और जॉन स्टुअर्ट मिल ने उन्नीसवीं शताब्दी में इसे परिष्कृत किया। यह एक कट्टर सामाजिक परिवर्तन के समय उभरा: औद्योगिक क्रांति, ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार, और लोकतांत्रिक मांगों का उदय। उपयोगितावाद ने नैतिक निर्णय के लिए एक धर्मनिरपेक्ष, तार्किक आधान प्रदान किया जो धार्मिक सिद्धांत, प्राकृतिक कानून, या अभिजात परंपरा पर निर्भर नहीं था। यह वादा किया कि नैतिक प्रश्नों का उत्तर अनुभवजन्य अवलोकन और तार्किक गणना के माध्यम से दिया जा सकता है — सुधारकों के लिए एक आकर्षक संभावना जो मनमाने विशेषाधिकारों को खत्म करना चाहते थे और एक अधिक न्यायपूर्ण समाज बनाना चाहते थे।
फिर भी उपयोगितावाद की विरासत गहराई से द्विअर्थी है। इसने कारागार सुधार, दासता का उन्मूलन, और कल्याण राज्य के विस्तार को प्रेरित किया। इसने औपनिवेशिक शोषण, युजेनिक्स, और अल्पसंख्यक अधिकारों के दमन के लिए बौद्धिक आवरण भी प्रदान किया। भारत में, उपयोगितावादी विचारों ने ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन को प्रभावित किया — कानूनों के संहितीकरण से लेकर निष्कर्षणात्मक आर्थिक नीतियों के औचित्य तक — जबकि भारतीय सामाजिक सुधारकों को भी प्रेरित किया जिन्होंने पारंपरिक सामाजिक प्रथाओं का मूल्यांकन और परिवर्तन करने के लिए तार्किक मानदंडों का उपयोग करना चाहा। उपयोगितावाद को समझने के लिए इसकी मुक्तिदायक क्षमता और इसकी खतरनाक सरलीकरण दोनों के साथ जुड़ने की आवश्यकता है।
जेरेमी बेंथम (1748–1832) एक अंग्रेज दार्शनिक, विधिवेत्ता, और सामाजिक सुधारक थे जिन्होंने पूर्व विचारकों के बिखरे हुए अंतर्दृष्टियों को एक व्यवस्थित नैतिक और राजनीतिक दर्शन में बदल दिया। उन्होंने "उपयोगितावाद" शब्द गढ़ा और अपना जीवन इसके सिद्धांतों को कानून, सरकार, शिक्षा, और कारागार डिजाइन में लागू करने के लिए समर्पित किया। बेंथम अपने युग में एक कट्टरपंथी थे: उन्होंने सार्वभौमिक मताधिकार (महिलाओं सहित), समलैंगिकता का अपराधीकरण समाप्त करने, मृत्युदंड का उन्मूलन, और सभी के लिए मुफ्त शिक्षा का वकालत किया। उनका मंत्र, "हर किसी को एक के लिए गिना जाए, किसी को एक से अधिक के लिए नहीं," एक जनतांत्रिक समानतावाद की अभिव्यक्ति थी जो अपने समय के लिए क्रांतिकारी थी।
बेंथम का मौलिक दावा सरल था: प्रकृति ने मानवजाति को दो संप्रभु मालिकों — दर्द और सुख — के अधीन रखा है। ये अकेले निर्धारित करते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और हम क्या करेंगे। उपयोगिता का सिद्धांत क्रियाओं, कानूनों, और संस्थानों का न्याय उनकी सभी प्रभावितों के लिए सुख (आनंद) या दुःख (पीड़ा) उत्पन्न करने की प्रवृत्ति से करता है। बेंथम ने सुख को केवल मात्रात्मक शब्दों में परिभाषित किया: आनंद की तीव्रता, अवधि, निश्चितता, और विस्तार। इसने सिद्धांत रूप में नैतिकता को गणना का विषय बना दिया — जिसे बेंथम ने "फेलिसिफिक कैलकुलस" कहा।
जॉन स्टुअर्ट मिल (1806–1873) उन्नीसवीं शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक थे और वह विचारक जिन्होंने उपयोगितावाद को सुख की एक कठोर गणना से एक सूक्ष्म नैतिक सिद्धांत में बदल दिया जो मानव गरिमा, व्यक्तिगत अधिकारों, और सांस्कृतिक विकास को समायोजित करने में सक्षम था। मिल की शिक्षा उनके पिता, जेम्स मिल, बेंथम के एक करीबी सहयोगी, द्वारा एक असाधारण त्वरित शिक्षा के प्रयोग में हुई थी। उन्होंने तीन साल की उम्र में ग्रीक, आठ साल में लैटिन, और किशोरावस्था तक बेंथम के पांडुलिपियों का संपादन किया। इस तीव्र शिक्षा ने एक चमकदार लेकिन भावनात्मक रूप से नाजुक युवा का उत्पादन किया जिसने बीस साल की उम्र में एक घबराहट का दौरा झेला, जिससे उन्हें केवल मात्रात्मक हेडोनिज़्म की पर्याप्तता पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित किया।
मिल का बेंथम के सिद्धांत का सबसे महत्वपूर्ण संशोधन उच्च और निम्न सुखों के बीच का अंतर था। Utilitarianism (1863) में, मिल ने तर्क दिया कि एक असंतुष्ट मनुष्य होना एक संतुष्ट सुअर होने से बेहतर है; एक असंतुष्ट सुकरात होना एक संतुष्ट मूर्ख होने से बेहतर है। इसने सुख के आकलन में एक गुणात्मक आयाम introduced किया: बौद्धिक, नैतिक, और सौंदर्यवादी सुख शारीरिक या संवेदी सुखों से गुणात्मक रूप से श्रेष्ठ हैं। एक समाज जो केवल शारीरिक सुख का अधिकतम करता है वह संतुष्ट जानवरों का समाज होगा, न कि फलते-फूलते मनुष्यों का।
उपयोगितावादी सिद्धांत के भीतर सबसे लगातार बहसों में से एक यह है कि उपयोगिता के सिद्धांत को किस स्तर पर लागू किया जाना चाहिए। क्या हमें प्रत्येक व्यक्तिगत क्रिया के परिणामों द्वारा मूल्यांकन करना चाहिए (कृत्य उपयोगितावाद), या क्या हमें क्रियाओं के वर्गों को शासित करने वाले नियमों का मूल्यांकन करना चाहिए (नियम उपयोगितावाद)? यह अंतर, जिसे J.J.C. स्मार्ट और डेविड लियोन्स जैसे दार्शनिकों ने मध्य-बीसवीं शताब्दी में स्पष्ट किया, इस बात पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है कि उपयोगितावाद न्याय, अधिकार, और पूर्वानुमेयता को कैसे संभालता है।
कृत्य उपयोगितावाद मानता है कि हर स्थिति में, हमें वह क्रिया चुननी चाहिए जो समग्र सुख का सर्वोच्च उत्पादन करती है। यह सर्वोच्च सुख सिद्धांत का सबसे सीधा अर्थ है और यह तर्कसंगत रूप से बेंथम का मूल दृष्टिकोण था। कृत्य उपयोगितावाद का लाभ इसकी लचीलापन है: यह हमें नियमों को तोड़ने की अनुमति देता है जब ऐसा करने से बेहतर परिणाम हों। नुकसान यह है कि यह भयानक क्रियाओं — यातना, झूठ, विश्वासघात — का औचित्य सिद्ध कर सकता है यदि वे सुख का शुद्ध वृद्धि उत्पन्न करते हैं। यह नैतिक जीवन को भी थका देता है, क्योंकि हर निर्णय के लिए परिणामों की एक नई गणना की आवश्यकता होती है।
नियम उपयोगितावाद मानता है कि हमें उन नियमों का पालन करना चाहिए जो, यदि सामान्य रूप से अपनाए जाएँ, तो सर्वोच्च सुख उत्पन्न करेंगे। एक व्यक्तिगत क्रया तब सही है जब यह एक उपयोगी नियम का अनुपालन करती है, यहाँ तक कि यदि वह विशेष क्रया सुख का अधिकतम नहीं करती। यह दृष्टिकोण सच्चाई-कहने, वादा-निर्वाह, और न्याय जैसी प्रथाओं की रक्षा करता है यह दिखाते हुए कि एक समाज जिसमें ये नियम सामान्य रूप से पाले जाते हैं, उससे अधिक सुखी है जिसमें हर कोई खरोंच से परिणामों की गणना करता है। आलोचक तर्क देते हैं कि नियम उपयोगितावाद कृत्य उपयोगितावाद में समाहित हो जाता है: यदि हमें एक नियम को तोड़ना चाहिए जब ऐसा करने से बेहतर परिणाम हों, तो हम वापस कृत्य उपयोगितावाद पर हैं; यदि हमें कभी भी नियम नहीं तोड़ना चाहिए, तो हम वास्तव में उपयोगितावादी नहीं हैं।
R.M. हेयर ने एक समझौता प्रस्तावित किया: हमें सामान्य स्थितियों में अंतर्ज्ञानी नियमों का उपयोग करना चाहिए (न मारें, न चुराएँ, वादे निभाएँ) लेकिन महत्वपूर्ण प्रतिबिंब में संलग्न होना चाहिए जब नियम टकराते हैं या जब असाधारण स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। यह "दो-स्तरीय" दृष्टिकोण उपयोगितावाद को नैतिक आदतों के महत्व को समायोजित करने की अनुमति देता है जबकि इसकी लचीलापन को बनाए रखता है। यह यह भी समझाता है कि अधिकांश लोगों को अधिकांश समय पारंपरिक नैतिकता का पालन करना चाहिए, जबकि नैतिक विशेषज्ञ (जैसे विधायक या न्यायाधीश) अधिक परिणामवादी तर्क में संलग्न हो सकते हैं।
उपयोगितावाद को नैतिक दर्शन के इतिहास में कुछ सबसे विनाशकारी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। ये आलोचनाएँ केवल अनुप्रयोग में कठिनाइयों की ओर इशारा नहीं करतीं; वे इस मौलिक धारणा को चुनौती देती हैं कि सुख नैतिक मूल्य का एकमात्र या प्राथमिक माप है। इन आलोचनाओं को समझना यह मूल्यांकन करने के लिए आवश्यक है कि क्या उपयोगितावाद राजनीतिक और सामाजिक न्याय के लिए एक पर्याप्त आधान प्रदान कर सकता है।
उपयोगितावाद भारत में एक दार्शनिक सिद्धांत के रूप में नहीं आया बल्कि एक प्रशासनिक उपकरण के रूप में आया। ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी, बेंथम और मिल की परंपरा में प्रशिक्षित, ने उपयोगितावादी तर्क को भारतीय कानून, शिक्षा, और शासन पर लागू किया। परिणाम विरोधाभासी थे: कुछ सुधार genuine रूप से प्रगतिशील थे जबकि अन्य ने औपनिवेशिक शोषण को गहरा किया। इस इतिहास को समझना यह मूल्यांकन करने के लिए आवश्यक है कि क्या उपयोगितावाद को इसकी औपनिवेशिक उपयोगों से अलग किया जा सकता है और क्या यह समकालीन भारतीय नीति-निर्माण के लिए कुछ प्रदान कर सकता है।
जेम्स मिल, जॉन स्टुअर्ट मिल के पिता, ने The History of British India (1818) लिखा, एक गहराई से पूर्वाग्रहपूर्ण कार्य जिसने भारतीय सभ्यता को पिछड़ा वर्गीकृत किया और ब्रिटिश तार्किक शासन की आवश्यकता में। यह दृष्टिकोण — कि औपनिवेशिक शासन भारतीय कल्याण को बढ़ावा देने में अपनी उपयोगिता द्वारा औचित्यसिद्ध था — कई ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा साझा किया गया जो खुद को सुधारक मानते थे। भारतीय कानून का संहितीकरण, सती का उन्मूलन, और अंग्रेजी शिक्षा का प्रोत्साहन सभी उपयोगितावादी आधार पर औचित्यसिद्ध किए गए थे। फिर भी उसी ढांचे ने उच्च कराधान, निष्कर्षणात्मक भूमि राजस्व नीतियों, और भारतीय उद्योगों के दमन को औचित्य सिद्ध किया जो ब्रिटिश हितों की सेवा करते थे। "सर्वोच्च सुख" को अक्सर ब्रिटिश शेयरधारकों और प्रशासकों को शामिल करने के लिए परिभाषित किया गया था।
उपयोगितावाद नैतिक दर्शन के सबसे सक्रिय क्षेत्रों में से एक बना हुआ है और सार्वजनिक नीति में सबसे प्रभावशाली ढांचों में से एक। "प्रभावी परोपकार" आंदोलन, जो लोगों को प्रति डॉलर सबसे अधिक अच्छा करने वाले धर्मार्थ संगठनों को दान करने के लिए प्रोत्साहित करता है, स्पष्ट रूप से उपयोगितावादी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास ने मशीनों में नैतिक निर्णय-निर्माण को कैसे प्रोग्राम किया जाए इस बारे में नए उपयोगितावादी प्रश्न उठाए हैं। COVID-19 महामारी ने दुनिया भर की सरकारों को उपयोगितावादी संतुलन में लगाया: सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा बनाम आर्थिक गतिविधि, जानें बचाना बनाम नागरिक स्वतंत्रताओं को बनाए रखना।
दार्शनिक पीटर सिंगर और विलियम मैकास्किल द्वारा स्थापित, प्रभावी परोपकार धर्मार्थ देने और करियर के विकल्प पर उपयोगितावादी तर्क लागू करता है। यह पूछता है: आपके संसाधनों और प्रतिभाओं को देखते हुए, आप सबसे अधिक अच्छा कैसे कर सकते हैं? आंदोलन ने मलेरिया रोकथाम, कृमि मुक्ति, और महामारी तैयारी की ओर अरबों डॉलर निर्देशित किए हैं। आलोचक तर्क देते हैं कि यह बहुत संकीर है, व्यवस्थित अन्याय की अनदेखी करता है और कारणों के बजाय लक्षणों पर ध्यान केंद्रित करता है। समर्थक जवाब देते हैं कि प्रभावी रूप से अच्छा करना प्रतीकात्मक रूप से अच्छा करने से बेहतर है, और उपयोगितावादी कठोरता धर्मार्थ संस्कृति को बदल सकती है।
जैसे-जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियाँ तेजी से परिणामी निर्णय लेती हैं — स्वास्थ्य सेवा, आपराधिक न्याय, और स्वायत्त वाहनों में — कौन सा नैतिक ढांचा उन्हें प्रोग्राम करने के लिए उपयोग किया जाए यह प्रश्न तात्कालिक हो जाता है। कुछ शोधकर्ता "उपयोगितावादी AI" के लिए वकालत करते हैं जो समग्र कल्याण का अधिकतम करेगा। अन्य चिंता करते हैं कि यह विनाशकारी परिणामों की ओर ले जाएगा यदि AI "कल्याण" को अप्रत्याशित तरीकों से व्याख्या करता है। "संरेखण समस्या" — यह सुनिश्चित करना कि AI प्रणालियाँ उन लक्ष्यों का पीछा करें जो मनुष्य वास्तव में चाहते हैं — तकनीकी शोध और दार्शनिक बहस दोनों का एक प्रमुख केंद्र बन गया है।
जलवायु परिवर्तन शायद अंतिम उपयोगितावादी चुनौती है: वर्तमान पीढ़ी को भावी पीढ़ियों के लाभ के लिए बलिदान करना चाहिए, और संपन्न राष्ट्रों को उत्सर्जन कम करना चाहिए जिनसे उन्हें लाभ हुआ है ताकि गरीब राष्ट्रों की रक्षा की जा सके जिन्होंने समस्या में सबसे कम योगदान दिया है। उपयोगितावाद अंतर-पीढ़ीगत न्याय और सीमाओं के पार लागत और लाभ के वितरण के बारे में सोचने के लिए एक ढांचा प्रदान करता है। हालाँकि, भविष्य के परिणामों के बारे में गहरा अनिश्चितता और बहुत अलग परिस्थितियों में लोगों के कल्याण की तुलना करने की कठिनाई उपयोगितावादी गणना को व्यवहार में अत्यधिक कठिन बनाती है।
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भारतीय संदर्भ:
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